Report-Durgesh Pandey
लक्ष्मनगढ़ में श्रीमद भागवत कथा सुनाते हुए संतदास जी महराज
चहनियां। जगत जब अपना होगा तो जगदीश्वर सपना हो जायेंगे। भगवान को पाने के लिए ढ़ाई अक्षर के प्रेम रूपी भक्ति शक्ति मुक्ति बृष्टि सृष्टि का ध्यान करते हुए भगवान के सत्संग में लगना होगा। इसीलिए असत्य और सत्य में विवेचना करने वाला ही पंडित है। वर्तमान समय में इसकी कमी होती जा रही है।

उक्त बातें लक्ष्मनगढ़ में आयोजित सप्त दिवसीय श्रीमद भागवत कथा के तीसरे दिन बुधवार को कथा श्रवण कराते हुए अयोध्या से पधारे श्री संतदास जी महराज ने कहा। उन्होंने कहा कि माता देवहुति द्वारा भगवान से केवल एक ही आग्रह किया गया कि हे परम पिता परमेश्वर आप मुझे एक बार माँ कह दीजिये।
जिसपर भगवान विष्णु ने समझते हुए कहा कि इस रूप में मैं आप को माँ नहीं कह सकता। बल्कि इसके लिए हमें मनुष्य रूप में अवतार लेना पड़ेगा। इसीलिए भगवान को कृष्ण अवतार लेना पड़ेगा। कथा सुनाते हुए उन्होंने कहा कि यज्ञ शब्द के बाद नौ अक्षर आता है और मनुष्य के शरीर में नौ छिद्र है। यदि हम मनुष्य अपने इन नौ छिद्र रूपी दरवाजे को संयमित करते हुए भगवान के चरणों में इनकी आहुति दे दे तो नारायण का मिलना मुश्किल नहीं होगा। उन्होंने कहा कि श्रीमद भागवत में वेद व्यास ने कहा है कि जो नारायण में रमेगा उसी को मनुष्य के रूप में ईश्वर धरती पर भेजते है।
भारत का मनुष्य आसक्ति में रहता है जिसे ईश्वरासक्ति में बदलना ही श्रीमद भागवत कथा का लक्ष्य है। कथा आयोजक राजेंद्र पाण्डेय ने कथा वाचक को माल्यार्पण कर और श्रीमद भागवत पुराण की आरती करके कथा शुरू करायी। कथा श्रवण करने वालों में मुख्य रूप से डॉ के एन पाण्डेय, जयश्याम त्रिपाठी, प्रधान दुर्गा पाण्डेय, डॉ संजय त्रिपाठी, दुर्गेश पाण्डेय, आलोक पाण्डेय, आत्मप्रकाश पाण्डेय, प्रिंस त्रिपाठी, बिनीत पाण्डेय सहित सैकड़ों लोग उपस्थित रहे।